भारतीय समाज की संरचना को समझने के लिए वर्ण व्यवस्था को समझना अत्यंत आवश्यक है।
वर्ण व्यवस्था प्राचीन भारत की एक सामाजिक प्रणाली थी, जिसका उद्देश्य समाज को सुव्यवस्थित करना और विभिन्न कार्यों का संतुलित विभाजन करना था।
हालाँकि समय के साथ इस व्यवस्था में कई विकृतियाँ आईं और यह भेदभाव का कारण बन गई।
आज वर्ण व्यवस्था को लेकर अनेक भ्रांतियाँ और विवाद देखने को मिलते हैं।
इस लेख में हम वर्ण व्यवस्था की
- उत्पत्ति,
- मूल अवधारणा,
- चारों वर्णों की भूमिका
और इसके सामाजिक प्रभाव को समझने का प्रयास करेंगे।

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति
वर्ण व्यवस्था का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में मिलता है।
इस सूक्त में समाज को एक विराट पुरुष के रूप में दर्शाया गया है, जिसके विभिन्न अंगों से चार वर्ण उत्पन्न हुए:
- मुख से – ब्राह्मण
- भुजाओं से – क्षत्रिय
- जंघाओं से – वैश्य
- पैरों से – शूद्र
यह वर्णन प्रतीकात्मक था, जिसका अर्थ यह था कि समाज के सभी वर्ग समान रूप से आवश्यक हैं, जैसे शरीर के अंग।
प्रारंभिक काल में वर्ण व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित थी, न कि जन्म पर।
वर्ण और जाति में अंतर
अक्सर वर्ण और जाति को एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग अवधारणाएँ हैं।
- वर्ण – कर्म, योग्यता और स्वभाव पर आधारित
- जाति – जन्म पर आधारित सामाजिक पहचान
प्राचीन भारत में व्यक्ति का वर्ण उसके कार्य और गुणों से तय होता था।
बाद के काल में यही वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई।

चार वर्णों की भूमिका
ब्राह्मण
ब्राह्मणों का कार्य था:
- वेदों का अध्ययन और अध्यापन
- यज्ञ, पूजा और धार्मिक अनुष्ठान
- समाज को नैतिक दिशा देना
वे ज्ञान और शिक्षा के प्रतिनिधि माने जाते थे।
क्षत्रिय
क्षत्रियों की भूमिका थी:
- राज्य की रक्षा करना
- शासन और प्रशासन चलाना
- युद्ध के समय नेतृत्व करना
राजा और योद्धा इसी वर्ग से होते थे।
वैश्य
वैश्यों का मुख्य कार्य था:
- कृषि
- व्यापार
- पशुपालन
- कर व्यवस्था को संभालना
वे समाज की आर्थिक रीढ़ माने जाते थे।
शूद्र
शूद्रों का कार्य था:
- कारीगरी
- शिल्पकला
- अन्य वर्गों की सेवा
प्रारंभिक काल में शूद्रों को हीन नहीं माना जाता था और उनका योगदान भी महत्वपूर्ण था।
समय के साथ हुआ परिवर्तन
समय बीतने के साथ वर्ण व्यवस्था में कठोरता आ गई।
कर्म आधारित व्यवस्था धीरे-धीरे जन्म आधारित जाति प्रथा में बदल गई।
इसके परिणामस्वरूप:
- ऊँच-नीच की भावना बढ़ी
- छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयाँ पैदा हुईं
- समाज में असमानता और भेदभाव फैल गया
जो व्यवस्था समाज को जोड़ने के लिए बनी थी, वही समाज को बाँटने लगी।
आधुनिक दृष्टिकोण और सुधार
19वीं और 20वीं शताब्दी में कई समाज सुधारकों ने वर्ण और जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की, जैसे:
- स्वामी विवेकानंद
- महात्मा गांधी
- डॉ. भीमराव अंबेडकर
स्वतंत्र भारत के संविधान ने:
- समानता को मूल अधिकार बनाया
- छुआछूत को अपराध घोषित किया
आज समाज को कर्म, योग्यता और मानवता के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
वर्ण व्यवस्था अपने मूल रूप में
कार्य विभाजन की एक व्यावहारिक और संतुलित प्रणाली थी।
लेकिन जब यह कर्म से हटकर जन्म आधारित बन गई, तो सामाजिक अन्याय का कारण बन गई।
आज आवश्यकता है कि हम इसके
मूल दर्शन — कर्म, समानता और सहयोग — को अपनाएँ
और भेदभाव से मुक्त समाज का निर्माण करें।
क्योंकि एक सभ्य समाज वही है
जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से हो, जन्म से नहीं।